“जब हटाने की बात उठी, तब एक डीएम ने भविष्य गढ़ दिया” — जौनसार-बावर के त्यूणी में हाईटेक लाइब्रेरी की सौगात, जनता बोली: ‘ऐसे अधिकारी ही हमारी ताकत हैं’
देहरादून/त्यूणी (गोविन्द शर्मा )
इन दिनों देहरादून में माहौल दो हिस्सों में बंटा नजर आ रहा है। एक तरफ कुछ लोग जिलाधिकारी (डीएम) के ट्रांसफर और उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ देहरादून से लेकर दूरस्थ पर्वतीय और जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर तक आम जनता उनके समर्थन में मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही है।
लोगों की आंखों में एक अलग ही भाव है—सम्मान, भरोसा और उम्मीद का। गांव-गांव में एक ही बात सुनाई दे रही है कि “अगर ऐसे अधिकारी को हटाया गया, तो हम भी चुप नहीं बैठेंगे, तिरंगा लेकर सड़कों पर उतरेंगे।”
इसी खींचतान और माहौल के बीच जिलाधिकारी ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने पूरे जौनसार-बावर, खासकर त्यूणी क्षेत्र के दिल को छू लिया है।
उन्होंने छात्रों के लिए एक ऐसी सौगात दी है, जिसकी न सिर्फ जरूरत थी, बल्कि जिसकी कल्पना तक यहां के लोगों ने कभी नहीं की थी।
करीब ₹14 लाख 84 हजार की लागत से बनने वाली हाईटेक लाइब्रेरी—यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उन सपनों का घर है, जो अब तक संसाधनों की कमी में कहीं दबकर रह जाते थे।
त्यूणी, जहां पहाड़ों के बीच बसे गांवों में आज भी बच्चे सीमित साधनों के साथ बड़े सपने देखने की हिम्मत जुटाते हैं, वहां अब उन्हें मिलेगा—
इंटरनेट, किताबें, शांत माहौल और वो वातावरण, जो किसी शहर के बड़े लाइब्रेरी में मिलता है।
यह वही क्षेत्र है जहां कई छात्र पढ़ाई के लिए घर से दूर जाने को मजबूर हो जाते थे, कई अपने सपनों को बीच रास्ते में छोड़ देते थे।
लेकिन अब…
“शायद कोई सपना अधूरा नहीं रहेगा।”
एक छात्र की आंखों में चमक थी, जब उसने कहा—
“सर, हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारे गांव में भी ऐसी लाइब्रेरी बनेगी… अब हमें भी लगता है कि हम कुछ बड़ा कर सकते हैं।”
एक छात्रा की आवाज में उम्मीद थी—
“अब हमें किताबों और इंटरनेट के लिए तरसना नहीं पड़ेगा… अब हम भी अपने सपनों को सच कर सकते हैं।”
गांव के एक बुजुर्ग की बात दिल छू गई—
“हमने अपनी जिंदगी में बहुत कमी देखी है… लेकिन आज लग रहा है कि हमारे बच्चों का भविष्य बदलने वाला है।”
यह पहली बार नहीं है जब जिलाधिकारी ने जौनसार-बावर के लिए कोई कदम उठाया हो। इससे पहले भी उन्होंने शिक्षा को लेकर कई पहल की हैं, लेकिन इस बार जो किया गया है, वह सीधे भविष्य को छूने वाला कदम है।
आज जब कुछ लोग उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं, वहीं आम जनता उनके काम को देख रही है, महसूस कर रही है।
लोग कह रहे हैं—
“कुर्सी नहीं, काम बोलता है… और इस बार काम बहुत बड़ा है।”
यह कहानी सिर्फ एक लाइब्रेरी की नहीं है…
यह कहानी है उस विश्वास की, जो एक अधिकारी और जनता के बीच बनता है।
यह कहानी है उस उम्मीद की, जो पहाड़ों के बीच से उठकर आसमान तक पहुंचना चाहती है।
सबसे भावपूर्ण और दमदार संदेश:
“विवादों के शोर के बीच, एक डीएम ने चुपचाप उन बच्चों के सपनों में रोशनी जला दी… जो अब तक अंधेरे में पढ़ रहे थे।”
