देहरादून : तारीख़ी जामा मस्जिद में आज शहर काज़ी हज़रत मुफ्ती हशीम अहमद क़ासमी ने पत्रकार बंधुओं को संबोधित करते हुए कहा कि देहरादून की साझी विरासत की बुनियाद इंसाफ़, अमन और संविधान के अक़दार (अधिकारों) पर कायम है। शूरा कमेटी के सदर हज़रत मुफ्ती सलीम अहमद क़ासमी और दिलशाद अहमद कुरैशी के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने साफ़ पैग़ाम दिया कि समाज की मज़बूती ‘अदल’ (न्याय) पर टिकी है, न कि ख़ुद-साख़्ता इंसाफ़ पर। काज़ी साहब ने ज़ोर देकर कहा, “इस्लाम का मूल संदेश समाज को न्यायपूर्ण बनाना है। इंसाफ़ कोई क़ानूनी लफ़्ज़ नहीं, बल्कि सभ्य समाज की अख़लाक़ी रीढ़ है।” उन्होंने शूरा कमेटी की ज़िम्मेदारी को अमन और ‘ख़िदमत-ए-ख़ल्क़’ से जोड़ा, जो आपसी मश्विरे और निष्पक्ष फ़ैसलों पर आधारित है।
पैग़म्बर-ए-इस्लाम के हवाले से उन्होंने चेतावनी दी कि क़ानून को किसी फ़र्द या गिरोह का खिलौना न बनने दें, वरना सामाजिक अमन को ख़तरा हो जाएगा। विवादों का हल केवल विधिसम्मत प्रक्रियाओं से ही हो। उत्तराखंड की अमनपसंद सरज़मीन का ज़िक्र करते हुए काज़ी साहब ने कहा कि ग़लतफ़हमियों का समाधान हिंसा नहीं, संवाद और अदल से होना चाहिए। विचारों की आज़ादी ज़िम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। सरकार से गुज़ारिश की कि क़ानून का शासन मज़बूत करे और न्यायपालिका पारदर्शिता सुनिश्चित करे, ताकि ग़रीब-कमज़ोर सुरक्षित रहें।
शूरा कमेटी के गठन को किसी विरोध का नहीं, बल्कि समाज की फ़लाह का क़दम बताया गया। काज़ी साहब ने मीडिया से अपील की कि इस पैग़ाम को सही भावना से जनता तक पहुँचाएँ, ताकि हर नागरिक सम्मानित और सुरक्षित महसूस करे। मौके पर पार्षद मुकीम अहमद, मुफ्ती ताहिर कासमी, आतिफ शेख़, नसीम अहमद, अब्दुल रहमान (शब्लू), सय्यद मौ. अरशी, हाकिम खान, आसिफ कुरैशी, हाजी शमशाद, मौ. आरिफ, असगर खान, सलीम अहमद, सुलेमान अंसारी, फहीम अहमद आदि मौजूद रहे। यह बयान देहरादून के सामाजिक समरसता को मज़बूत करने की दिशा में अहम क़दम माना जा रहा है।
