जौनसार-बावर की पहाड़ियों में बसे बृनाड गाँव की सुबहें हमेशा से मेहनत, सादगी और संघर्ष की कहानियाँ सुनाती रही हैं। इन्हीं पहाड़ियों के बीच जन्मे एक युवा ने अब धीरे-धीरे प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी है। यह कहानी है जिला पंचायत उपाध्यक्ष अभिषेक सिंह चौहान की — एक ऐसे युवा की, जो राजनीति को पद नहीं बल्कि सेवा मानकर आगे बढ़ रहा है।
कहा जाता है कि नेतृत्व अचानक नहीं बनता, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और संस्कार से तैयार होता है। अभिषेक सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
उनके परिवार की राजनीतिक और सामाजिक यात्रा की शुरुआत उनके दादाजी स्वर्गीय गुलाब सिंह से मानी जाती है। उस समय संसाधन सीमित थे, लेकिन समाज के लिए काम करने का जज़्बा बड़ा था। गांवों की छोटी-छोटी समस्याओं को सुलझाने से लेकर लोगों को संगठित करने तक, उन्होंने जनसेवा की एक मजबूत नींव रखी। जौनसार-बावर के कई बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं जब विकास का हर छोटा कदम लोगों के सामूहिक प्रयास से आगे बढ़ता था।
इस विरासत को आगे बढ़ाया उनके बेटे और उत्तराखंड की राजनीति के बड़े नामों में शामिल, चकराता विधानसभा से छह बार विधायक रह चुके
प्रीतम सिंह
ने।
प्रीतम सिंह ने वर्षों तक विधानसभा में जौनसार-बावर और देहरादून जिले की आवाज उठाने का काम किया। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं को लेकर लगातार प्रयास उनके राजनीतिक जीवन की पहचान बने। स्थानीय लोग अक्सर कहते हैं कि जौनसार-बावर में दिखाई देने वाले विकास के अधिकांश काम उसी लंबे संघर्ष का परिणाम हैं।
इसी राजनीतिक और सामाजिक माहौल में बड़े हुए अभिषेक सिंह ने बचपन से ही जनता और जनप्रतिनिधि के रिश्ते को बहुत करीब से देखा।
लोग बताते हैं कि उनके घर का दरवाजा हमेशा आम लोगों के लिए खुला रहता था — कोई अपनी समस्या लेकर आता, तो उसे सुना भी जाता और समाधान के लिए प्रयास भी किया जाता।
शायद यही अनुभव उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया।
जब अभिषेक सिंह ने जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ने का ऐलान किया, तब बहुत लोगों ने इसे एक युवा की शुरुआत माना। लेकिन धीरे-धीरे यह शुरुआत एक जनआंदोलन जैसी लगने लगी।

गांव-गांव जाकर लोगों से सीधे बात करना, युवाओं के साथ बैठकर योजनाएँ बनाना और बुजुर्गों से सलाह लेना — यह उनका नियमित तरीका बन गया।
उनकी सबसे अलग पहचान यह बनी कि वे लोगों से बातचीत करते समय औपचारिक दूरी नहीं रखते।
कई जगहों पर लोगों ने देखा कि वे कुर्सी पर बैठने के बजाय जमीन पर बैठकर समस्याएं सुनना ज्यादा पसंद करते हैं।
उनका एक वाक्य अक्सर लोगों के बीच दोहराया जाता है —
“हमारे लिए सबसे पहले जनता है, उसके बाद हम हैं।”
यह सोच धीरे-धीरे युवाओं को उनकी ओर खींचने लगी।
पिछले कुछ समय में उन्होंने लगभग 30 से अधिक युवाओं को सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
किसी को संगठन की जिम्मेदारी देना, किसी को जनसमस्याओं पर काम करने के लिए प्रेरित करना — यह उनकी कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
जिला पंचायत उपाध्यक्ष बनने के बाद उनकी सक्रियता और बढ़ गई।
लोगों का कहना है कि उनका कार्यालय अब केवल एक राजनीतिक दफ्तर नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा स्थान बन गया है जहां आम लोग बिना झिझक अपनी बात रख सकते हैं। कई लोग इसे “जनता दरबार” कहने लगे हैं।
जौनसार-बावर से लेकर देहरादून तक, उनका नाम अब एक उभरते युवा नेतृत्व के रूप में लिया जाने लगा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ पारिवारिक विरासत का प्रभाव नहीं, बल्कि उनकी अपनी कार्यशैली और लोगों के बीच मौजूदगी का परिणाम है।
उनकी राजनीति में एक खास बात दिखाई देती है —
परंपरा और नई सोच का मेल।
एक तरफ दादाजी और पिता की जनसेवा की विरासत, और दूसरी तरफ युवाओं को साथ लेकर आगे बढ़ने की नई ऊर्जा।
आज जब वे प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह बना रहे हैं, तो जौनसार-बावर के कई लोग इसे एक निरंतर चल रही यात्रा का अगला पड़ाव मानते हैं —
एक ऐसी यात्रा, जो गुलाब सिंह से शुरू होकर प्रीतम सिंह तक पहुंची और अब अभिषेक सिंह के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।
और शायद यही कारण है कि गांवों में अक्सर एक बात सुनाई देती है —
“नेतृत्व विरासत से मिल सकता है, लेकिन विश्वास काम से ही बनता है।”
