देहरादून जनपद के जनजाति क्षेत्र जौनसार-बावर की शांत पहाड़ियों में बसा त्यूणी तहसील का राजस्व गांव भूट अब एक ऐसे सवाल के साथ जी रहा है, जिसका जवाब अभी तक किसी के पास नहीं है। सात दिसंबर 2025 की वह रात, जो सामान्य दिनों की तरह ही शुरू हुई थी, सुबह होते-होते तीन ज़िंदगियाँ निगल चुकी थी। एक सरकारी स्कूल के कमरे से तीन राजमिस्त्रियों के शव बरामद हुए, जिनमें एक ही परिवार के दो सगे भाई शामिल थे। यह घटना पहली नज़र में हादसा लगी, लेकिन समय के साथ यह मामला रहस्य, संदेह और अविश्वास की परतों में उलझता चला गया।
उस सुबह गांव की दिनचर्या बदली नहीं थी, बदली थी सिर्फ एक चीज़—काम पर जाने वाले तीन लोग नहीं दिखे। जब स्थानीय ग्रामीण उस स्कूल के कमरे तक पहुँचे, जहाँ तीनों रात को ठहरे थे, तो भीतर का दृश्य स्तब्ध कर देने वाला था। तीनों के शव एक ही कमरे में पड़े थे। न कोई चीख-पुकार, न किसी संघर्ष के स्पष्ट निशान। दरवाज़ा बंद था या खुला—इस बिंदु पर तब भी मतभेद थे और आज भी हैं। लेकिन यह निर्विवाद है कि तीनों की मौत एक ही समय, एक ही स्थान पर हुई।
घटना राजस्व गांव में हुई थी, इसलिए शुरुआती कार्रवाई का दायित्व रेगुलर पुलिस नहीं बल्कि राजस्व प्रशासन पर था। सूचना मिलते ही तहसील प्रशासन मौके पर पहुँचा, पंचनामा किया गया और शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। दो शवों को विकासनगर ले जाया गया, जबकि एक मृतक के परिजनों ने पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया। उस समय परिजन और स्थानीय लोग यही मान रहे थे कि एलपीजी गैस लीकेज के कारण दम घुटने से तीनों की मौत हुई है। यही धारणा उस दौर में इस मामले को आगे बढ़ने से रोकने वाली सबसे बड़ी वजह बनी।राजस्व प्रशासन का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी दम घुटने से मृत्यु की पुष्टि हुई है और प्रथम दृष्टया किसी आपराधिक साजिश के संकेत नहीं मिले। लेकिन यह निष्कर्ष परिजनों और ग्रामीणों के मन को संतुष्ट नहीं कर सका। सवाल उठने लगे कि अगर यह गैस लीकेज था तो कमरे में वेंटिलेशन की स्थिति क्या थी, गैस सिलेंडर की तकनीकी जांच कहां है, और सबसे बड़ा सवाल—एक ही परिवार के दो युवा भाई एक साथ कैसे मौत के मुंह में चले गए। गांव में चर्चा बढ़ी, फुसफुसाहटें तेज़ हुईं और यह मामला धीरे-धीरे प्रशासनिक फाइलों से निकलकर सार्वजनिक बहस का विषय बनने लगा।

समय बीतने के साथ सामाजिक संगठनों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी सवाल उठाने शुरू किए। दबाव बढ़ा तो मामला राजस्व पुलिस से रेगुलर पुलिस को सौंप दिया गया। थाना त्यूणी पुलिस ने केस संभालते ही जांच की दिशा बदल दी। पुलिस ने साफ किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट को अंतिम सत्य मानकर जांच बंद नहीं की जा सकती। पुराने सैंपल दोबारा लैब भेजे गए, घटनास्थल के हालात की फिर से समीक्षा की जा रही है और हर संभावित पहलू को ध्यान में रखकर जांच आगे बढ़ाई जा रही है। पुलिस का रुख यह है कि चाहे मौत दम घुटने से हुई हो या किसी अन्य कारण से, तीन लोगों की एक साथ मौत को केवल एक हादसा मानकर फाइल बंद नहीं की जा सकती।
इस बीच स्थानीय विधायक ने भी तहसील प्रशासन और एसएसपी देहरादून से वार्ता कर पूरे मामले की जानकारी ली। प्रशासन अब भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर दम घुटने से मौत की बात कह रहा है, जबकि पुलिस जांच को खुला रखे हुए है। यही विरोधाभास इस पूरे प्रकरण को और पेचीदा बनाता है।
तीन मौतों के पीछे की सच्चाई से परे, इस घटना ने तीन घरों को हमेशा के लिए बदल दिया है। तीनों मृतक अपने-अपने परिवारों के इकलौते कमाने वाले थे। आज उन घरों में न सिर्फ मातम है, बल्कि आर्थिक अनिश्चितता भी है। किसी के सिर से बेटे का साया उठ गया, किसी से भाई छिन गया, किसी से पति। ग्रामीणों की मांग है कि निष्पक्ष जांच के साथ-साथ सरकार इन परिवारों को आर्थिक सहायता भी दे, ताकि वे इस आघात से उबर सकें।
भूट गांव का वह स्कूल कमरा आज भी खड़ा है—खामोश, सवालों से भरा हुआ। राजस्व प्रशासन इसे हादसा मान रहा है, पुलिस हर एंगल की जांच कर रही है और समाज सच जानना चाहता है। यह मामला अब सिर्फ तीन मौतों का नहीं रहा, बल्कि उस भरोसे का है, जो सिस्टम पर किया जाता है। जौनसार-बावर आज भी उसी एक जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है—सच क्या है।
