देहरादून (गोविंद शर्मा): जहां एक ओर पूरा प्रदेश रंग, गुलाल और अबीर की खुशबू में सराबोर था, वहीं देहरादून के एक कोने में कुछ ऐसे नन्हें चेहरे भी थे जिनकी होली कभी सड़कों की धूल में खो जाया करती थी। जिन बच्चों ने त्योहारों को अक्सर दूर से देखा, जिनके लिए रंगों का मतलब सिर्फ सिग्नल पर बिकता गुलाल था, वे शायद यह सोच भी नहीं सकते थे कि एक दिन जिले का सर्वोच्च अधिकारी उनके बीच आकर उनके साथ होली खेलेगा।

इसी उम्मीद से परे एक पल उस समय साकार हुआ, जब सविन बंसल आधुनिक इंटेंसिव केयर सेंटर पहुंचे। बच्चों ने जैसे ही अपने “डीएम सर” को सामने देखा, उनकी आंखों में अविश्वास से विश्वास की चमक उतर आई। कुछ बच्चे दौड़ते हुए आए, किसी ने झिझकते हुए गुलाल लगाया, तो किसी ने गले लगाकर अपने मन की बरसों की कृतज्ञता एक ही वाक्य में कह दी —
“थैंक यू सर… आप हमारे लिए भगवान हो…”
यह शब्द सुनते ही माहौल बदल गया। प्रशासनिक गरिमा और औपचारिकता के बीच खड़े जिलाधिकारी की आंखें नम हो उठीं। वह पल किसी सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि मानवता के सबसे सच्चे भाव का जीवंत दृश्य था। जहां कभी ये बच्चे ट्रैफिक सिग्नल पर हाथ फैलाते दिखते थे, आज वही हाथ रंगों से भरे थे। जहां कभी चेहरों पर थकान और असुरक्षा थी, वहां अब आत्मविश्वास और मुस्कान थी। होली के रंग उनके कपड़ों पर ही नहीं, उनके भविष्य पर भी चढ़ते दिखाई दे रहे थे।
डीएम ने बच्चों के साथ बैठकर बातें कीं, उनकी पढ़ाई के बारे में पूछा, खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रेरित किया और कहा कि अब उनका जीवन किसी भी सामान्य बच्चे की तरह अवसरों से भरा रहेगा। बच्चों ने भी खुलकर हंसी बांटी, गीत गाए, और पहली बार महसूस किया कि वे अकेले नहीं हैं। यह सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं था, बल्कि उन सपनों का जश्न था जो कभी फुटपाथ पर बिखरे पड़े थे। यह उस विश्वास का उत्सव था जो प्रशासन और समाज के बीच बन रहा है।
जब पूरा प्रदेश होली के रंगों में डूबा था, तब देहरादून में एक अलग ही रंग दिखाई दे रहा था — संवेदनशील प्रशासन का रंग, मानवीय स्पर्श का रंग और बदले हुए भविष्य का रंग। उस दिन बच्चों की हंसी ने साबित कर दिया कि अगर इरादे नेक हों और नेतृत्व संवेदनशील हो, तो सड़कों पर बिखरा बचपन भी सम्मान, शिक्षा और सपनों की नई उड़ान पा सकता है।
और शायद इस होली की सबसे बड़ी जीत यही थी —
कि कुछ नन्हें चेहरों की मुस्कान हमेशा के लिए लौट आई।
