डिग्रियाँ बढ़ती गईं, अवसर घटते गए: क्या देश का युवा सिर्फ सस्ती मजदूरी के लिए पढ़ रहा है?

गोविन्द शर्मा (पत्रकार ) त्यूणी
कहानी: “उसने कहा—मैं हार नहीं मानूँगी”
एक छात्रा, ₹10,000 की नौकरी और एमएससी का फॉर्म… यह सिर्फ उसकी कहानी नहीं, हमारे समय की कहानी है।
आज का दिन सामान्य था। कॉलेज परिसर में नए सत्र की हलचल थी। कहीं प्रवेश फॉर्म भरे जा रहे थे, कहीं दस्तावेज़ों का सत्यापन हो रहा था। हर चेहरे पर अलग-अलग भाव थे—किसी की आँखों में उत्साह, किसी के चेहरे पर घबराहट, तो कोई अपने भविष्य के सपनों को लेकर चुपचाप लाइन में खड़ा था। इसी भीड़ में मेरी नज़र एक लड़की पर जाकर ठहर गई।
वह किसी से ज़्यादा बात नहीं कर रही थी। हाथ में एक फाइल थी, जिसमें सावधानी से रखे हुए प्रमाणपत्र, अंकपत्र और ऊपर रखा हुआ एमएससी प्रवेश का फॉर्म। कंधे पर पुराना बैग, चेहरे पर हल्की-सी थकान, लेकिन आँखों में ऐसा आत्मविश्वास जो शायद केवल संघर्ष करने वालों के पास होता है।
पत्रकार होने के नाते मैंने उससे बातचीत शुरू की। “कहाँ से आई हो?” उसने धीरे से कहा— “हिमाचल प्रदेश से।” मैंने पूछा— “परिवार वहीं रहता है?” उसने सिर हिलाकर कहा—
“हाँ… माँ-पापा वहीं हैं। मैं पढ़ाई के लिए उत्तराखंड आई हूँ।” इतना सुनकर लगा कि यह एक सामान्य बातचीत होगी। लेकिन आगे जो उसने बताया, उसने मेरे भीतर कई सवाल खड़े कर दिए।
मैंने पूछा— “पढ़ाई के साथ और क्या करती हो?” उसने बिना किसी झिझक के जवाब दिया— “₹10,000 महीने की नौकरी करती हूँ। उसी से किराया देती हूँ, खाना खाती हूँ और अपनी पढ़ाई का खर्च निकालती हूँ।” उसने यह बात ऐसे कही, जैसे इसमें कोई असाधारण बात ही न हो। लेकिन मेरे लिए यह असाधारण थी। एक तरफ़ एमएससी का सपना… दूसरी तरफ़ ₹10,000 की नौकरी…
और इनके बीच खड़ी थी एक बेटी, जिसने अपने सपनों को ज़िंदा रखने के लिए अपना घर, अपना राज्य और अपने लोगों का साथ छोड़ दिया था। मैंने उससे पूछा— “घर की याद नहीं आती?”
वह कुछ पल चुप रही। फिर मुस्कुराकर बोली— “बहुत आती है… लेकिन अगर हर बार यादों के साथ लौट जाऊँ, तो सपने अधूरे रह जाएँगे। इसलिए खुद को समझा लेती हूँ कि अभी संघर्ष का समय है।”
उसकी इस बात ने मेरे भीतर जैसे एक सन्नाटा भर दिया। मैं सोचने लगा—हम अक्सर अख़बारों में बेरोज़गारी के आँकड़े पढ़ते हैं। रोज़गार के दावे सुनते हैं।
नई योजनाओं की घोषणाएँ देखते हैं। लेकिन इन सबके बीच ऐसी कितनी कहानियाँ हैं, जो कभी किसी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं बन पातीं। यह लड़की किसी आंदोलन का चेहरा नहीं थी।
वह किसी मंच पर भाषण नहीं दे रही थी। उसने किसी के खिलाफ़ नारा भी नहीं लगाया। वह बस अपनी ज़िंदगी से लड़ रही थी। सुबह नौकरी… दिन में कॉलेज… शाम को पढ़ाई…
और रात को अगले दिन की चिंता। मैंने उससे आख़िरी सवाल पूछा— “अगर कभी सब कुछ बहुत मुश्किल लगे, तब क्या करती हो?” उसने बिना सोचे जवाब दिया—
“माँ की आवाज़ याद कर लेती हूँ। उन्होंने घर से निकलते समय कहा था—’बेटी, मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।’ बस वही याद रखती हूँ।” मैंने उसकी ओर देखा।
उसके हाथ में एमएससी का फॉर्म था। लेकिन मुझे उस फॉर्म में सिर्फ़ एक प्रवेश आवेदन नहीं दिखाई दिया। मुझे उसमें एक परिवार की उम्मीद दिखाई दी।
एक माँ की दुआ दिखाई दी। एक पिता का विश्वास दिखाई दिया। और एक बेटी का मौन संघर्ष दिखाई दिया। वह चली गई।
भीड़ में खो गई। लेकिन उसके जाने के बाद भी उसका एक सवाल मेरे साथ रह गया— क्या हमारे देश में शिक्षा केवल डिग्रियाँ बाँटने तक सीमित रह जाएगी, या उन डिग्रियों के अनुरूप अवसर भी मिलेंगे?
क्या किसी छात्र या छात्रा का सबसे बड़ा सपना सिर्फ़ इतना रह जाना चाहिए कि पढ़ाई जारी रखने के लिए कोई छोटी-सी नौकरी मिल जाए?
या फिर हम ऐसा समाज बना पाएँगे, जहाँ किसी बेटी को अपने सपनों और अपनी रोज़ी-रोटी के बीच रोज़ समझौता न करना पड़े? उस दिन मैंने सिर्फ़ एक छात्रा को नहीं देखा।
मैंने उस पीढ़ी का चेहरा देखा, जो शिकायत कम करती है, संघर्ष ज़्यादा। जो टूटती है, लेकिन बिखरती नहीं।
जो थकती है, लेकिन रुकती नहीं। और शायद इसलिए जाते-जाते उसके कहे हुए पाँच शब्द मेरे कानों में अब भी गूँज रहे हैं— “मैं हार नहीं मानूँगी, सर…”
शायद यही पाँच शब्द आज भारत के लाखों युवाओं की सबसे बड़ी पहचान हैं।
देश की सड़कों पर आज जो आवाज़ सबसे बुलंद सुनाई दे रही है, वह किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि उस युवा की है जिसने अपनी जवानी किताबों के बीच गुज़ार दी। यह आवाज़ उस विद्यार्थी की है जिसने अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत की, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, उच्च शिक्षा प्राप्त की और यह विश्वास रखा कि एक दिन उसकी योग्यता उसे सम्मानजनक जीवन देगी। लेकिन आज वही युवा एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसके हाथ में डिग्री तो है, पर भविष्य धुंधला दिखाई देता है।
देश के विश्वविद्यालय हर वर्ष लाखों विद्यार्थियों को बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएससी, एमकॉम, बीटेक, एमटेक और अन्य उच्च डिग्रियाँ प्रदान करते हैं। दीक्षांत समारोहों में विद्यार्थियों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि शिक्षा ही सफलता का सबसे बड़ा माध्यम है। लेकिन जब यही युवा रोजगार की तलाश में निकलता है, तब उसे बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि उसकी वर्षों की मेहनत का मूल्य केवल ₹10,000 से ₹15,000 प्रतिमाह तक सीमित है।
यह प्रश्न केवल वेतन का नहीं है। यह उस व्यवस्था का प्रश्न है जिसने शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी को लगातार बढ़ने दिया। एक ओर सरकारें नई शिक्षा नीति, कौशल विकास और आत्मनिर्भर भारत की बात करती हैं, तो दूसरी ओर लाखों शिक्षित युवा वर्षों तक भर्ती परीक्षाओं, परिणामों और नियुक्तियों की प्रतीक्षा करते रहते हैं। कई परीक्षाएँ समय पर नहीं होतीं, कई भर्ती प्रक्रियाएँ वर्षों तक अधर में लटकी रहती हैं और कई बार पेपर लीक जैसी घटनाएँ युवाओं के विश्वास को तोड़ देती हैं।
एक सामान्य परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए खेत बेच देता है, कर्ज़ लेता है, अपनी आवश्यकताओं में कटौती करता है। माँ अपने गहने गिरवी रखती है, पिता अपनी पूरी कमाई बच्चों की शिक्षा पर लगा देता है। परिवार को विश्वास होता है कि शिक्षा उनके बच्चे के जीवन की दिशा बदल देगी। लेकिन जब वही बच्चा उच्च शिक्षा के बाद भी मामूली वेतन वाली नौकरी के लिए लंबी कतार में खड़ा दिखाई देता है, तब सबसे बड़ा आघात केवल उस युवा को नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार को लगता है।
आज सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि एक एमए, एमएससी या एमकॉम डिग्रीधारी युवक और बारहवीं पास युवक को लगभग समान वेतन पर काम करना पड़े, तो वर्षों की उच्च शिक्षा का मूल्यांकन कैसे किया जाएगा? क्या डिग्री केवल प्रमाणपत्र बनकर रह जाएगी? क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना रह गया है? क्या युवाओं को यह संदेश दिया जा रहा है कि योग्यता और मेहनत का आर्थिक मूल्य अब समाप्त हो चुका है?
यह भी सच है कि हर व्यक्ति सरकारी नौकरी नहीं पा सकता। निजी क्षेत्र की अपनी आवश्यकताएँ और सीमाएँ हैं। लेकिन किसी भी विकसित राष्ट्र की पहचान इस बात से होती है कि वहाँ योग्य युवाओं को उनकी शिक्षा और कौशल के अनुरूप अवसर और सम्मान मिले। यदि लाखों शिक्षित युवा अपनी क्षमता से बहुत कम स्तर के रोजगार के लिए मजबूर हों, तो यह केवल व्यक्तिगत असफलता नहीं, बल्कि नीतिगत चुनौती है।
देश का युवा आज सड़कों पर इसलिए नहीं है कि उसे संघर्ष पसंद है। वह इसलिए सड़कों पर है क्योंकि उसे लगता है कि उसकी आवाज़ निर्णय लेने वालों तक नहीं पहुँच रही। उसकी माँग केवल नौकरी नहीं, बल्कि समयबद्ध भर्ती, पारदर्शी चयन प्रक्रिया, निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था और योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक रोजगार है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा और रोजगार के बीच मजबूत पुल बनाया जाए। विश्वविद्यालयों की पढ़ाई को उद्योगों की आवश्यकताओं से जोड़ा जाए। भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध बनाया जाए। रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए। युवाओं को केवल प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि अवसर दिए जाएँ। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उसका शिक्षित और ऊर्जावान युवा होता है।
इतिहास गवाह है कि जब किसी देश का युवा निराश होता है, तब उसका प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहता; वह अर्थव्यवस्था, सामाजिक संतुलन और भविष्य की दिशा को भी प्रभावित करता है। इसलिए यह समय युवाओं की आवाज़ को सुनने का है, उसे टालने का नहीं।
अंततः प्रश्न बहुत सीधा है—यदि वर्षों की पढ़ाई, लाखों रुपये का खर्च, अनगिनत परीक्षाएँ और अथक परिश्रम के बाद भी एक युवा को अपने सपनों से समझौता करना पड़े, तो क्या हम वास्तव में शिक्षा का सम्मान कर रहे हैं?
युवा आज केवल एक प्रश्न पूछ रहा है—
“क्या हमारी डिग्रियाँ हमारे भविष्य की पहचान बनेंगी, या केवल दीवार पर टंगे हुए कागज़ का एक फ्रेम?”
